मुख्य विवरण
- स्थान:प्रभास पाटन, वेरावल, गीर सोमन जिला, गुजरात।
- महत्वपूर्ण:यह हिन्दू धर्म के 12 ज्योतिर्लिंग में से प्रथम ज्योतिर्लिंग माना जाता है।
इतिहास और पुनर्निर्माण
- प्राचीन उल्लेख:पुराणों के अनुसार इस मंदिर का पहला निर्माण चन्द्रदेव (सोम) ने करवाया था।
- आक्रमण:इतिहास में यह भव्य मंदिर कई बार विदेशी अक्रांताओं (जैसे 1026 में महमूद गज़नी) द्वारा बनाया गया है।
- आधुनिक मंदिर:स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसके पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। वर्तमान भव्य मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा 11 मई 1951 को राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की मृत्यु हो गई थी।
दर्शन और समय
- आरती का समय:मंदिर में प्रतिदिन तीन बार आरती होती है- प्रातः 7:00 बजे, दोपहर 12:00 बजे और सायं 7:00 बजे।
- लाइट शो:पुराने जमाने में शाम को ‘साउंड एंड लाइट शो’ भी होता है जो मंदिर के इतिहास का विवरण है।
पौराणिक कथा और उत्पत्ति
- चन्द्रदेव का श्राप:सिद्धांत यह है कि दक्ष प्रजापति के श्राप से चंद्रदेव का तेज कम हो गया था।
- शिव की तपस्या:चंद्रदेव ने प्रभास क्षेत्र में भगवान शिव की तपस्या की।
- सोमनाथ नाम:शिवजी ने चंद्रदेव का श्राप आंशिक रूप से मुक्त कराया। चन्द्र (सोम) द्वारा स्थापित किये जाने के कारण उनका नाम सोमनाथ रखा गया।
- त्रिवेणी संगम:यह मंदिर कपिला, हिरण और सरस्वती नदियों के संगम पर स्थित है।
आक्रमण और इतिहास
- प्राचीन सिद्धांत:शास्त्रों के अनुसार, सबसे पहले यह मंदिर सतयुग में सोने का, त्रेता युग में चांदी का और द्वापर युग में लकड़ी का बना था।
- विदेशी आक्रमण:अपनी विशाल संपत्ति और धार्मिक महत्व के कारण यह मंदिर कई अक्रांताओं का बना हुआ है।
- महमूद गजनवी का हमला:सन 1026 में महमूद गजनवी मंदिर पर आक्रमण और भारी धन-संपत्ति की लूट।
- अन्य आक्रमण:इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी (1299), जाफर खान (1395), औरंगजेब (17वीं शताब्दी) ने भी मंदिर को खंडित कराया।
- आक्रमणकारी:महमूद ग़ज़नवी (गजनी का सुल्तान)।
- वर्ष व दिनांक:जनवरी 1026 (6 से 8 जनवरी के बीच भयंकर तूफान हुआ)।
- :उस समय यह क्षेत्र गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) वंश के राजा भीम प्रथम के प्रभाव/संरक्षण में था।
- हानि और लूट:गजनवी की सेना ने मंदिर को ध्वस्त कर दिया, उनकी प्रसिद्ध ज्योर्तिलिंग फ़ार्म और अपार संपत्ति (लगभग 2 करोड़ दीनार या कई टन सोना- अरबा) लूटकर अपने साथ ले गई।
पुनर्निर्माण:राजा भीमदेव प्रथम, कुमारपाल और महिपाल प्रथम जैसे कई हिंदू राजाओं ने समय-समय पर मानस जीर्णोद्धार कारखाने पर काम किया। आधुनिक भारत में पुनर्निर्माण
- सरदार पटेल का संकल्प:स्वतंत्रता के बाद 13 नवंबर 1947 को सरदार वल्लभभाई ने इसके पुनर्निर्माण का निर्णय लिया।
- प्राण प्रतिष्ठा:11 मई 1951 को भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नई बोली की प्राण प्रतिष्ठा की।
- वर्तमान स्वरूप:आज का भव्य मंदिर चालुक्य शैली (मारू-गुर्जर शैली) में बना हुआ है, जिसके बल पर स्वर्ण कलश सुशोभित है।
सोमनाथ मंदिर की समीक्षाएँ-
- सोम मंदिर को ऐतिहासिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत सकारात्मक समीक्षाएँ मिलीं, जो इसकी भव्यता, दिव्यता और प्रबंधन की भूमिका निभाती हैं।
- सकारात्मक समीक्षाएँ (अच्छी समीक्षाएँ)
- दिव्य वातावरण:भक्तों का कहना है कि मंदिर का वातावरण अत्यंत शांत, सकारात्मक और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर है।
- वास्तुकला:इसकी नागा शैली का निर्माण और भव्य वास्तुशिल्प संरचना बहुत आकर्षित करती है।
- समुद्रतट का दृश्य:अरब सागर के किनारे स्थित होने के कारण यहां की प्राकृतिक प्राकृतिकता और शाम की आरती का अनुभव अनोखा माना जाता है।
- बेहतरीन व्यवस्थाएँ:मंदिर परिसर में निःशुल्क जूता घर, लॉकर सुविधा और साफ-सफाई की व्यवस्था काफी है।
- लाइट एंड साउंड शो:रात का लेजर और लाइट शो मंदिर के आकर्षण को और बढ़ाता है।
युगों के अनुसार निर्माण की अवधारणा
- सत्ययुग: सिद्ध होता है कि सबसे पहले चंद्रमा ने इसे सोने का खंडित किया था।
- त्रेता युग: रावण ने इसे चाँदी का विध्वंस कहा।
- द्वापर युग: श्री कृष्ण ने इसे चंदन की लकड़ी से बनाया था।
- कलियुग: बाद में राजा ने इसे पत्थर और भव्य रूप दिया।
- सुधार की बातें (Areas to reform)
- सख्त सुरक्षा नियम:मंदिरों के अंदर मोबाइल फोन, कैमरे और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान ले जाने की अनुमति नहीं है, जिसके कारण धार्मिक स्थलों के बाहर ही जाम लग जाता है।
- भीड़ड़:मुख्य दर्शन के समय और त्योहारों पर भारी भीड़ के कारण लंबी कतारों का सामना करना पड़ सकता है।
- आस-पास के क्षेत्र:कुछ यात्रियों के अनुसार मंदिर के बाहर का कुछ अविश्वसनीय भीड़भाड़ वाला हो सकता है।
सोमनाथ मंदिर को कब और कैसे खोला गया-
- रहस्योद्घाटन में सोमनाथ मंदिर पर “17 बार” हमलों की बात कही जाती है, जो असल में महमूद गंजवी के कुल 17 भारतीय अभियानों से जुड़ी हुई है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार यह मंदिर मुख्यतः पर है 7 से अधिक बार अलग-अलग शासकों और शासकों ने खंडित या लूट की।
प्रमुख आक्रमण और आक्रमण
- 725 ईस्वी: सिंध के अरब सेंचुरीदार अल जुनैद की सेना द्वारा मंदिर पर पहला आक्रमण किया गया।
- 1026 ईसा पूर्व: गजनी के शासक महमूद गजनवी ने तहस-नहस पर आक्रमण कर मंदिर को खंडित कर दिया, भारी सोना-यरात लूटा और ज्योतिर्लिंग को खंडित कर दिया।
- 1299 ईस्वी: दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति उलुग खान ने मंदिर मंदिर लूटा और मूर्ति के दौरान गुजरात अभियान चलाया
- 1395 ईस्वी: दिल्ली सल्तनत के गुजरात के गवर्नर जफर खान ने मंदिर का तीसरी बार उद्घाटन किया।
- 1469 ईस्वी: मऊ के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने इसे तोड़ दिया।
- 1665 और 1706 ई.पू.: मुगल सम्राट औरंगजेब ने दो बार टुडवाने और उसके शासकों का आदेश दिया।
सोमनाथ मंदिर के नीचे क्या मिला-
- भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गांधीनगर और वैज्ञानिक विशेषज्ञों द्वारा की गई ग्राउंड पेनेटरिंग रेडियो (जीपीआर) की जांच में सोमनाथ मंदिर के नीचे लगभग 12 मीटर की गहराई में एक तीन खंड ‘एल’ आकार की पक्की इमारत और उसके आसपास बौद्ध गुफाओं के संकेत मिले हैं।
मुख्य प्रकाशन और खोज
- तीन दीवारें: जीपीआर सर्वेक्षण के अनुसार, जमीन के नीचे लगभग 7.3 से 12 मीटर की गहराई में एक पक्की संरचना और उसका प्रवेश द्वार मौजूद है, जो तीन हिस्सों (परत) में बना हुआ है।।
- बौद्ध गुफाएँ: मंदिर के बाहरी दरवाजे के पास स्थित सरदार वल्लभ भाई पटेल की मूर्ति के आसपास प्राचीन बौद्ध गुफाएँ और अवशेषों का भी पता चला है।
- प्रोफेसर रिपोर्ट: स्पेशलिस्ट की टीम ने करीब 32 डिसएबल्ड साइंटिस्ट की यह रिपोर्ट अध्ययन के बाद सोमनाथ ट्रस्ट को सौंपी गई थी।
- सोमनाथ मंदिर में कितना सोना था-
ऐतिहासिक और बीबीसी हिंदी की रिपोर्ट के अनुसार, सन 1026 में जब महमूद गज़नवी ने सोम मंदिर पर आक्रमण किया था, तब उस मंदिर से लगभग 6 टन (लगभग 6000 कि.) सोना और भारी मात्रा में अन्य बहुमूल्य खजाना लूटा गया था।मुख्य बातें
- सोने की मात्रा: इतिहासकारों के अनुसार मंदिरों के अवशेषों और सामानों से लगभग 6 टन शुद्ध सोना लूटा गया था। कुछ पुराने संसाधनों में इसे 20 मिलियन से अधिक सोने के दीनार के बारे में भी बताया गया है।
- पौराणिक मिथक: पौराणिक कथाओं के अनुसार, सबसे पहले चंद्रदेव (सोमराज) ने इस मंदिर को सोने का मौका दिया था। इसके बाद समय के साथ राजकुमार ने इसमें सोना, चांदी और कई रत्न शामिल किये।
सोमनाथ मंदिर के बारे में 10 मुख्य बातें:
- सोमनाथ मंदिर को हिंदू धर्म के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है।
- यह मंदिर भारत के गुजरात राज्य के वेरावल में अरब सागर के तट पर स्थित है।
- पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर का सबसे पहला निर्माण स्वयं ने किया थाचन्द्रदेव (माताराम) ने कहा था।
- ‘सोमनाथ’ शब्द का अर्थ ‘चंद्रमा के स्वामी’ होता है।
- यह मंदिर कपिला, हिरण और सरस्वती नदियों के त्रिवेणी संगम के पास स्थित है।
- इतिहास में आक्रमणकारियों द्वारा कई बार तोड़े जाने के बावजूद इस मंदिर का बार-बार पुनर्निर्माण किया गया।
- वर्तमान भव्य मंदिर का पुनर्निर्माण स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल की इच्छा से हुआ।
- यह आधुनिक मंदिर 1 दिसंबर 1955 को राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्र द्वारा समर्पित किया गया था।
- मंदिर के निर्माण में शाम को एक घंटे का साउंड एंड लाइट शो होता है, जिसमें इसके इतिहास का सुंदर वर्णन किया गया है।
- इस प्रसिद्ध तीर्थस्थल का प्रबंधन और संचालन सोमाली ट्रस्ट द्वारा किया जाता है।
सोमनाथ मंदिर का रहस्य-
- भगवान शिव के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से पहला (पहला) ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह गुजरात के वेरावल में प्रभास पाटन में स्थित है।
- पौराणिक महत्व और कथा
- चंद्रदेव की तपस्या: पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष ने अपने तेज (प्रकाश) से खो रहे चंद्रदेव (सोम) ने यहां भगवान शिव की घोर तपस्या की थी।
- सोमन नाम: शिवजी ने सबसे अच्छा चंद्रमा को श्राप से मुक्ति का उपाय दिया।। इसके बाद चंद्रमा ने माता पार्वती और भगवान शिव से यहां सदा निवास करने की प्रार्थना की। चंद्रमा (सोम) द्वारा स्थापित जाने के कारण सोम (सोम के नाथ) कहा गया था।
- पहला मंदिर: सिद्ध होता है कि सबसे पहले चंद्रदेव ने इसे सोने का खण्डित किया था, जिसके बाद अन्य राजाओं ने चाँदी, लकड़ी और फिर पत्थरों से विभिन्न कालों में पुनर्निर्मित ढाँचे बनाए।
- हवा में तैरने का रहस्य: ऐतिहासिक तीर्थयात्रियों और विदेशी यात्रियों के आगमन में उल्लेख मिलता है कि प्राचीन सोम की मूर्ति में चुंबकीय शक्ति या पत्थरों का प्रभाव था, जिससे मंदिर के बीच हवा में तैरता (लेरेट) होता था।
- आक्रमण और पुनर्निर्माण: 11वीं शताब्दी में महमूद गज़नवी ने इस प्राचीन मंदिर और उसके चमत्कारिक शिलालेख का निर्माण किया था। भारत की आज़ादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रयास से वर्तमान भव्य मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया।